क़ुरआन - काफ़िरों के साथ पैग़म्बर का व्यवहार कैसा था?

  
आयत क्या कहती है? काफ़िरों के साथ पैग़म्बर का व्यवहार कैसा था?

एक गुट अपने पूरे अस्तित्व के साथ ईश्वर की ओर आता है और पूरी तरह से उसके समक्ष नतमस्तक रहता है जबकि दूसरा गुट उद्दंडता का मार्ग अपनाता है और ईश्वर का इन्कार कर देता है।

सूरए लुक़मान की आयत क्रमांक 22, 23 व 24 का अनुवाद:
और जो कोई अपना रुख़ ईश्वर की ओर कर ले और वह सद्कर्मी भी हो तो निश्चित रूप से उसने मज़बूत सहारे को थाम लिया है और सारे मामलों का अंत ईश्वर ही की ओर है। और जिस किसी ने कुफ़्र अपनाया तो उसका कुफ़्र आपको दुखी न करे कि उन्हें पलटकर आना तो हमारी ही ओर है। तो जो कुछ वे करते रहे हैं उससे हम उन्हें अवश्य ही अवगत करा देंगे। निःसंदेह ईश्वर (लोगों के) दिलों तक की बात जानता है।  हम उन्हें थोड़ा संपन्न करेंगे फिर उन्हें एक कठोर दंड की ओर खींच ले जाएँगे।

संक्षिप्त टिप्पणी:
पैग़म्बर इस बात से प्रसन्न नहीं होते थे कि उन्हें यातनाएं देने वाले काफ़िरों को उनके कुफ़्र के कारण दंडित होना पड़ता है बल्कि वे हमेशा उनके साथ हमदर्दी का व्यवहार करते थे और उनके पथभ्रष्ट हो जाने पर दुखी होते थे।

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:
  1. अगर पूरी सृष्टि ईश्वर के समक्ष नतमस्तक है और ईश्वर ने उसे हम मनुष्यों की सेवा में दे रखा है तो हम क्यों न ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहें?
  2. मनुष्य इस संसार में अपनी स्थिति की रक्षा के लिए विभिन्न सहारों का चयन करता है लेकिन ईमान वाले केवल ईश्वर पर भरोसा करते हैं।
  3. ईमान वाले ईश्वर की मज़बूत रस्सी का सहारा लेकर और भले कर्म करके अपनी मुक्ति का मार्ग खोजते हैं।
  4. पैग़म्बर और इमाम भी ईश्वर की मज़बूत रस्सियों में से हैं।
  5. सांसारिक जीवन में हमें अपना मार्ग, संसार के भविष्य और उसके बारे में चिंतन पर दृष्टि रख कर चुनना चाहिए ताकि आयु के अंत में हमारा बुरा अंजाम न हो।
Source