क़ुरआन - अपने पूर्वजों की आस्थाओं के अनुसरण का तर्क कहां तक सही है?

  
आयत क्या कहती है? अपने पूर्वजों की आस्थाओं के अनुसरण का तर्क कहां तक सही है?

जो लोग ईश्वर के बारे में संदेह पैदा करते हैं उनके पास कोई स्पष्ट तर्क नहीं है।


सूरए लुक़मान की आयत क्रमांक 21 का अनुवाद:
और अब जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज़ का अनुसरण करो जो ईश्वर ने उतारी है तो वे कहते हैं कि (नहीं) बल्कि हम तो उस चीज़ का अनुसरण करेंगे जिस पर हमने अपने बाप-दादा को पाया है। क्या यद्यपि शैतान उन्हें दहकती आग के दंड की ओर बुलाए तब भी (वे उन्हीं का अनुसरण करेंगे)?

संक्षिप्त टिप्पणी:
बहुत से लोगों का तर्क अपने पूर्वजों के संस्कारों का अनुसरण है। वे अपने पूर्वजों के ग़लत संस्कारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं और ईश्वरीय मार्गदर्शन के अनुसरण के बजाए अपने पिताओं की ग़लत आस्थाओं और कर्मों पर ही चलते हैं जबकि यह ग़लत व शैतानी तर्क है और इस बात का कारण बनता है कि वे भी अपने पूर्वजों की तरह ही नरक में जाएं।

इस आयत से मिलने वाले पाठ:
  1. पूर्वजों की ग़लत आस्थाओं पर आग्रह और उनका अंधा अनुसरण, सत्य को स्वीकार करने के मार्ग की बाधाओं में से एक है और मनुष्य की बुद्धि व विचार को सत्य समझने से रोक देता है।
  2. राष्ट्रीय संस्कृति व संस्कारों की सुरक्षा उसी समय तक मूल्यवान है जब तक वह बुद्धि व धर्म के अनुकूल हो अन्यथा वह मनुष्य के पतन का कारण बन सकती है।
  3. शैतान निरंतर मनुष्य को ग़लत व भ्रष्ट मार्गों की ओर बुलाता रहता है।
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